S Jaishankar के अमेरिका में 5 बड़े बयान: आतंकवाद से लेकर चीन और टैरिफ तक, बोले- ‘कूटनीति अब एक्सट्रीम स्पोर्ट बन गई है’
न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री S Jaishankar ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में भारत-अमेरिका संबंधों, आतंकवाद, चीन, वैश्विक व्यापार, टैरिफ और बदलती विश्व व्यवस्था पर भारत का पक्ष विस्तार से रखा। सोमवार को हुए इस संवाद में अमेरिका के पूर्व राजनयिक डेनियल रसेल ने जयशंकर से कई सवाल किए, जिनके जवाब में विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को लेकर कई अहम बातें कहीं।
जयशंकर ने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि भारत के लिए सीमा पार आतंकवाद लंबे समय से गंभीर सुरक्षा चिंता रहा है। उनके मुताबिक यदि भारत के साझेदार इस चिंता की गंभीरता को पर्याप्त रूप से नहीं समझते हैं, तो उसका असर द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है। उन्होंने मौजूदा दौर में अमेरिका की अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को संभालने की नीति, भारत की बहु-संबंध वाली कूटनीति और चीन के साथ भारत के रिश्तों पर भी बात की।
आतंकवाद पर भारत की चिंता नहीं समझी गई तो रिश्तों पर असर पड़ेगा
भारत-अमेरिका संबंधों पर चर्चा के दौरान जयशंकर ने आतंकवाद को भारत की प्रमुख सुरक्षा चिंताओं में से एक बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने कई दशकों तक अपने पड़ोसी क्षेत्र से आने वाले आतंकवाद का सामना किया है। ऐसे में भारत की इस चिंता को उसके साझेदारों द्वारा समझना जरूरी है।
जयशंकर का कहना था कि अगर भारत की किसी प्राथमिक चिंता को पूरी तरह समझा या महत्व नहीं दिया जाता, तो स्वाभाविक रूप से उसका असर रिश्तों पर पड़ता है। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं और सीमा पार आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार अपनी स्थिति रख रहा है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि किसी भी रणनीतिक साझेदारी में केवल व्यापार या आर्थिक हित ही पर्याप्त नहीं होते। साझेदार देशों के बीच एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं और प्राथमिकताओं की समझ भी महत्वपूर्ण होती है।
1. टैरिफ विवाद पर जयशंकर: अमेरिका के साथ रिश्ते आसान नहीं रहे
कार्यक्रम में अमेरिका के पूर्व राजनयिक डेनियल रसेल ने जयशंकर से भारत-अमेरिका संबंधों में पिछले एक वर्ष के दौरान व्यापार और टैरिफ को लेकर आई मुश्किलों के बारे में सवाल किया। उनसे पूछा गया कि दोनों देशों के रिश्तों को फिर बेहतर दिशा में ले जाने के लिए क्या किया जा सकता है।
जयशंकर ने जवाब में कहा कि सिर्फ भारत के लिए ही अमेरिका के साथ रिश्ते मुश्किल नहीं हुए हैं। उनके मुताबिक दुनिया के कई देशों के लिए अमेरिका के साथ संबंध पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गए हैं। उन्होंने इसे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों की वास्तविकता के रूप में पेश किया।
जयशंकर ने साथ ही कहा कि भारत और अमेरिका के बीच यदि व्यापार समझौता होता है तो इससे दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने में योगदान मिल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि शुरुआती दौर में जिस तेजी से प्रगति की उम्मीद की जा रही थी, उसे जटिल वास्तविकताओं के सामने चुनौती मिली है।
इससे साफ है कि भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार और टैरिफ अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है। इसका प्रभाव व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ रहा है।
2. अमेरिका-चीन संबंधों पर जयशंकर: भारत की नीति पर पहले सवाल उठते थे
जयशंकर ने अमेरिका की विदेश नीति में आए बदलाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक समय अमेरिका में यह धारणा थी कि भारत को अपने विकल्प सीमित रखने चाहिए और उसे मुख्य रूप से वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्तों पर ध्यान देना चाहिए।
लेकिन जयशंकर के मुताबिक अब स्थिति बदल चुकी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका खुद अलग-अलग शक्तियों और देशों के साथ एक साथ संबंध संभालने की कोशिश कर रहा है। उनके अनुसार जिस तरह की बहु-विकल्प वाली कूटनीति को लेकर पहले भारत से सवाल किए जाते थे, आज अमेरिका भी उसी तरह के विकल्पों के साथ आगे बढ़ रहा है।
जयशंकर ने इसे बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बताया। उनके अनुसार बड़ी शक्तियां अब एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद और संबंधों के कई रास्ते खुले रखना चाहती हैं।
अमेरिका का ‘दिखावा’ खत्म होने की बात क्यों कही?
जयशंकर ने इसी संदर्भ में कहा कि अमेरिका द्वारा भारत से विकल्प सीमित रखने की अपेक्षा करने वाली पुरानी स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। उनका तर्क था कि आज अमेरिका खुद अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को एक साथ संतुलित कर रहा है।
यह टिप्पणी ऐसे समय हुई है जब अमेरिका चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद और आर्थिक संबंधों को भी संभालने की कोशिश कर रहा है। हाल के दिनों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव को कम करने के लिए कुछ टैरिफ में कटौती पर सहमति की खबरें भी सामने आई हैं।
जयशंकर की टिप्पणी का व्यापक संदर्भ यही था कि वर्तमान विश्व व्यवस्था में किसी एक देश के साथ अत्यधिक निर्भरता के बजाय अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को बनाए रखना कई देशों के लिए रणनीतिक जरूरत बनता जा रहा है।
3. बहुध्रुवीय दुनिया पर जयशंकर: ‘च्यूइंग गम’ अब सबके पास होगा
विदेश मंत्री ने दुनिया में बढ़ रही बहुध्रुवीयता पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां देश किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहे हैं।
उन्होंने इसे कुछ हद तक मजाकिया अंदाज में समझाते हुए कहा कि अब यह ‘च्यूइंग गम’ हर किसी के पास होगा और हर देश उसे अपने तरीके से इस्तेमाल करेगा।
इसका मतलब यह था कि देश अपने आर्थिक, सुरक्षा और रणनीतिक हितों के अनुसार अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखेंगे। किसी एक गुट के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय विकल्प खुले रखने की नीति आने वाले समय में और व्यापक हो सकती है।
जयशंकर ने यह भी संकेत दिया कि जब अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति इसी तरह की बहु-दिशात्मक कूटनीति अपनाती है, तो उसका असर बाकी दुनिया पर भी पड़ता है। इससे बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है।
4. चीन से रिश्तों पर बोले जयशंकर: 2024-25 के मुकाबले आज स्थिति बेहतर
भारत-चीन संबंधों को लेकर जयशंकर ने अपेक्षाकृत सकारात्मक लेकिन सावधान रुख रखा। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते पिछले कुछ समय की तुलना में बेहतर हुए हैं। 2020 में सीमा पर तनाव के बाद दोनों देशों के संबंधों में गंभीर गिरावट आई थी, लेकिन सीमा पर स्थिति में सुधार के साथ द्विपक्षीय संबंधों में भी धीरे-धीरे बदलाव आया है।
जयशंकर ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत और चीन के बीच सभी समस्याएं समाप्त हो गई हैं। उन्होंने कहा कि 2024-25 की तुलना में वर्तमान स्थिति बेहतर है, लेकिन सीमा पर वास्तविक परिस्थितियां दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करती रहेंगी।
उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहना किसी के हित में नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में फंसे रहना उचित नहीं है, जिससे किसी तीसरे देश को फायदा मिल सके।
भारत-चीन रिश्तों में सीमा की स्थिति क्यों महत्वपूर्ण है?
जयशंकर के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भारत-चीन संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में सीमा पर शांति और स्थिरता को महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
2020 के बाद दोनों देशों के बीच तनाव ने राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया था। अब सीमा पर स्थिति में आए बदलाव के बाद संवाद और रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि भारत की ओर से यह संकेत भी दिया गया है कि सीमा से जुड़े मुद्दे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
इसलिए जयशंकर का संदेश एक साथ दो पहलुओं पर आधारित था—एक तरफ मौजूदा स्थिति को पहले से बेहतर बताना और दूसरी तरफ यह स्पष्ट करना कि सीमा पर हालात का असर व्यापक संबंधों पर पड़ता रहेगा।
5. वैश्विक व्यवस्था पर जयशंकर: कूटनीति अब ‘एक्सट्रीम स्पोर्ट’
जयशंकर के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा वैश्विक कूटनीति को लेकर उनकी टिप्पणी रही। उन्होंने मौजूदा दुनिया को बेहद जटिल बताते हुए कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में युद्ध, आर्थिक दबाव, व्यापारिक प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े जोखिम बढ़ गए हैं।
उन्होंने कहा कि देशों के बीच आर्थिक निर्भरता बनी हुई है, लेकिन उसी निर्भरता को कई बार दबाव बनाने के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। व्यापार, शिपिंग रूट, महत्वपूर्ण संसाधनों और बाजारों तक पहुंच जैसे मुद्दे अब रणनीतिक दबाव के साधन बन सकते हैं।
इसी संदर्भ में जयशंकर ने कहा कि “कूटनीति एक एक्सट्रीम स्पोर्ट बन गई है।” उनके अनुसार राजनयिकों को अब एक तरफ तत्काल और जोखिम भरे फैसलों के परिणामों को संभालना पड़ता है, तो दूसरी तरफ पुराने और लंबे समय से चले आ रहे विवादों को भी आगे बढ़ाना पड़ता है।
दुनिया के सामने 4F संकट की चुनौती
जयशंकर ने वैश्विक अस्थिरता के संदर्भ में 4F संकट का भी उल्लेख किया—Food यानी भोजन, Fuel यानी ईंधन, Fertiliser यानी खाद और Finance यानी वित्त।
इन चार क्षेत्रों में किसी एक क्षेत्र की बड़ी समस्या का असर दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव से ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकते हैं, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट से खाद्य और औद्योगिक कीमतों पर असर पड़ सकता है और आर्थिक दबाव विकासशील देशों के लिए वित्तीय मुश्किलें बढ़ा सकता है।
जयशंकर का तर्क था कि दुनिया अब ऐसे दौर से गुजर रही है जहां आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को अलग-अलग करके देखना मुश्किल होता जा रहा है। एक देश की समस्या दूसरे देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
आर्थिक निर्भरता अब रणनीतिक दबाव का साधन भी
जयशंकर ने यह भी बताया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में देशों के बीच निर्भरता एक वास्तविकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कोई देश किसी महत्वपूर्ण जरूरत के लिए दूसरे देश पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है।
ऐसी स्थिति में जिस देश के पास संसाधन या आपूर्ति का नियंत्रण है, वह उस निर्भरता को बातचीत में दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। यही वजह है कि आज कई देश अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने, नए साझेदार तलाशने और महत्वपूर्ण संसाधनों के लिए वैकल्पिक स्रोत विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
इस बदलते माहौल ने विदेश नीति को केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रखा है। अब ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, सप्लाई चेन और महत्वपूर्ण खनिज जैसे मुद्दे भी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं।
भारत की विदेश नीति का बड़ा संदेश: विकल्प खुले रखना
न्यूयॉर्क में जयशंकर की टिप्पणियों को एक साथ देखा जाए तो उनका बड़ा फोकस भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संबंध वाली विदेश नीति पर दिखाई देता है। भारत अमेरिका के साथ संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है, लेकिन साथ ही रूस, यूरोप, जापान, चीन और अन्य देशों के साथ भी अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखता है।
जयशंकर ने अमेरिकी नीति में बदलाव का उदाहरण देते हुए इसी व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत किया। उनके अनुसार आज बड़ी शक्तियां भी एक ही साझेदार या एक ही ध्रुव पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कई विकल्पों के साथ आगे बढ़ रही हैं।
अमेरिका के साथ रिश्तों में व्यापार और सुरक्षा दोनों अहम
जयशंकर की टिप्पणियों से यह भी स्पष्ट हुआ कि भारत-अमेरिका संबंधों में सिर्फ टैरिफ या व्यापार ही चर्चा का विषय नहीं है। आतंकवाद और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।
भारत के लिए सीमा पार आतंकवाद एक लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा चिंता है और जयशंकर ने कहा कि साझेदार देशों को इस चिंता की गंभीरता समझनी चाहिए। दूसरी ओर, व्यापार के मोर्चे पर दोनों देशों के बीच बातचीत और संभावित समझौते को रिश्तों में सुधार से जोड़कर देखा गया है।
इस तरह भारत-अमेरिका संबंधों में सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और भू-राजनीति एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे बन चुके हैं।
जयशंकर के बयान से दुनिया को क्या संकेत मिला?
न्यूयॉर्क में दिए गए जयशंकर के बयानों में एक बात लगातार दिखाई दी—बदलती वैश्विक व्यवस्था में देशों को पुराने ढांचे और स्थायी गुटों के बजाय तेजी से बदलती परिस्थितियों के हिसाब से अपनी कूटनीति को ढालना होगा।
आतंकवाद से लेकर टैरिफ तक, चीन से लेकर सप्लाई चेन तक और 4F संकट से लेकर बहुध्रुवीय व्यवस्था तक, जयशंकर ने अलग-अलग मुद्दों को एक ही व्यापक वैश्विक बदलाव से जोड़कर देखा।
उनकी टिप्पणी कि “कूटनीति एक एक्सट्रीम स्पोर्ट बन गई है” इसी बदलते दौर की तस्वीर पेश करती है, जहां देशों को अपने हितों की रक्षा करते हुए एक साथ कई शक्तियों और संकटों से निपटना पड़ रहा है।