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जीवन सूक्त : अभाव, विवशता का जनक है – संदीप अखिल

जीवन के एक कठोर किन्तु सच्चे पक्ष को उजागर करने वाली अंग्रेजी की प्रसिद्ध कहावत है “Beggars can’t be choosers” यह कहावत हर दौर में शत प्रतिशत खरा साबित होता रहा है। आवश्यकता और अभाव में विकल्प के लिए कोई स्थान नही होता । जो उपलब्ध है उसे ही स्वीकार करने की अनिवार्यता होती है।आमतौर पर विकल्पहीनता की स्थिति आर्थिक होती है मगर यह आवश्यक नही है रिश्तों, अवसरों और हालातों में भी यह विवशता लागू हो सकती है।

अभाव का भी एक लाभ है, वह हमें विनम्र बनाता है और स्वीकार्यता का पाठ सिखाता है। जब विकल्प सीमित होता है तब शिकायत के स्थान पर कृतज्ञता के भाव जागते हैं। आक्रोश और उत्तेजना, धैर्य बन जाती है। अभाव का भाव मनुष्य को परिस्थितियों से लड़ने का साहस देता है। संसाधन और अवसरों की प्रचुरता चयन का अधिकार सुरक्षित रखती है अन्यथा विवेक यही कहता है कि जो मिला है उसे ही श्रेष्ठ मानकर आगे बढ़ा जाए।

रामचरितमानस के सिद्धांत भी यही संकेत देते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों मनुष्य को कर्म प्रधान बनकर, धैर्य और विवेक के साथ कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। अभाव के क्षणों में लिया गया हर छोटा निर्णय भविष्य की दिशा तय करता है। जरूरत के समय अहंकार का पूर्णतः त्याग और उपलब्ध अवसरों का स्वीकार ही बुद्धिमानी है। अभावग्रस्त व्यक्तियों की स्वीकार्यता आगे चलकर उनके लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलने का काम करती है।

वैसे “Beggars can’t be choosers” जैसी दशा बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मानी गई है अपने कर्म और पुरुषार्थ से इस परिस्थिति से खुद को दूर रखा जा सकता है।

“सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।”

कर्म की महानता को बताने वाली इस प्रसिद्ध पंक्तिका अर्थ है कि इस संसार में सभी सुख, वैभव और वस्तुएं मौजूद हैं लेकिन जो इंसान मेहनत नहीं करता उसे कुछ नहीं मिलता। इस दुनिया में आगे बढ़ने और खुश रहने के लिए हर चीज़ मौजूद है मगर बिना कठिन परिश्रम या पुरुषार्थ के कुछ भी हासिल नही होता। आलसी और काम से जी चुराने वाले लोगों का जीवन समझौतों के साथ ही व्यतीत होता है।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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