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अयोध्या की धरती पर जब रामभक्तों को गोलियों से भूना गया…

“ मुलायम सरकार के आदेश पर बहा आस्था का लाल तपता रक्त” 
एक ऐसा अध्याय, जो 6 दिसम्बर की हर आहट के साथ फिर जीवित हो उठता है

अयोध्या… वह पवित्र नगरी जिसे हिंदू समाज अपनी सांसों में बसाए हुए है। करोड़ों वर्षों की तपस्थली, लाखों वर्षों की आस्था और अनगिनत युगों का सांस्कृतिक केंद्र। मगर इसी धरती पर 1990 में वह काला अध्याय लिखा गया, जिसे हिंदू समाज आज भी भूल नहीं पाया है।

यह वो समय था जब देश में राम मंदिर आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था। संत, महात्मा, गृहस्थ, युवा, बुजुर्ग—हर हिंदू के भीतर “जय श्रीराम” की गर्जना बिजली की तरह दौड़ रही थी। आखिरकार सदियों का अपमान मिटाने का समय आ चुका था।

लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता उस समय उन आवाज़ों के खिलाफ खड़ी थी। मुखिया थे समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव—एक ऐसे नेता जिन्होंने सार्वजनिक मंचों पर कहा था कि “अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।”
उनका मतलब साफ था—रामजन्मभूमि आंदोलन को किसी भी कीमत पर रोकना है, चाहे इसके लिए राज्य की गोलियां ही क्यों न चलानी पड़ें।

 30 अक्टूबर 1990: जब अयोध्या रोई, सरयू लाल हुई 

सुबह का समय था। सरयू किनारे हजारों कारसेवक एकजुट थे। उनके पास न कोई लाठी, न हथियार… वे नारे लगा रहे थे—
“रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे!”

हिंदू समाज उत्साह में था।
लेकिन सत्ता बेचैन थी।

जब शांतिपूर्ण कारसेवकों का विशाल समूह जन्मभूमि की ओर बढ़ा, तब सुरक्षाबलों को साफ आदेश मिल चुका था—

“फायर करो। किसी भी कीमत पर उन्हें आगे नहीं बढ़ने देना।”

पहले हवा में फायरिंग हुई, फिर दूसरी चेतावनी और फिर…
सीधे शरीर पर।
सीधे छाती पर।
सीधे सिर पर।

अयोध्या की गलियों में भगवा दुपट्टे गोलियों से छलनी होकर गिरते गए।
“जय श्रीराम” की आवाज़ें चीखों में बदल गईं।
निहत्थे भक्त भागे नहीं—वे चुपचाप गोलियां खाते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी मौत भी रामलला की राह का पत्थर बन जाएगी।

कई साधु तो अंतिम सांस तक “राम” नाम जपते हुए अपना शरीर छोड़ गए।

राज्य सरकार ने इसे “कानून व्यवस्था” कहा, लेकिन हर हिंदू ने इसे सनातन पर प्रहार कहा।

 2 नवंबर 1990: जब अयोध्या का सूरज रामभक्तों की राख पर उगा 

दो दिन का वक़्फ़ा गुजर गया, लेकिन कारसेवकों की भीड़ और संकल्प नहीं टूटा।
30 अक्टूबर को जिसने मृत्युदंड देखा था, वही भी 2 नवंबर को फिर मोर्चे पर लौट आया।

सरकार एक बार फिर घबरा गई। आदेश फिर वही था—
“गोलियां चलाओ।”

इस बार क्रूरता और अधिक थी।
इस बार निशाना और सटीक था।
इस बार गोलियां चेतावनी नहीं, सीधे “मारने” के इरादे से चलाई गईं।

सैकड़ों रामभक्त उस दिन अयोध्या की मिट्टी में समा गए।
उनके शव घंटों तक सड़क पर पड़े रहे।
पहचान मिटा दी गई।
परिवारों को सूचना नहीं दी गई।
कईयों की अंतिम यात्रा बिना किसी संस्कार के संपन्न हुई।

साक्षी आज भी कहते हैं—
“सरयू लाल हो गई थी… खून से।”

मुलायम सरकार का रवैया: आस्था पर शासन की तानाशाही 

मुलायम सिंह यादव ने बाद में इन हत्याओं को सही ठहराते हुए कहा—
“अगर जरूरत पड़ी तो हम और गोलियां चलवाते।”

यह वाक्य आज भी हिंदू समाज को झकझोर देता है।
रामभक्तों की प्राणोत्सर्ग कोई ‘लॉ एंड ऑर्डर’ नहीं था, बल्कि राज्य सत्ता द्वारा हिंदू आस्था पर खुला हमला था।

1990 में अयोध्या में जो हुआ, वह हिंदू भावनाओं के विरुद्ध सबसे क्रूर सरकारी दमन था।

 6 दिसम्बर क्यों महत्वपूर्ण है? 

क्योंकि 6 दिसम्बर सिर्फ एक ढांचे का ध्वंस नहीं है—
वह 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 की उन लाशों की प्रतिशोध की लौ है,
जो अयोध्या की धरती पर अपमान सहते हुए गिरी थीं।

क्योंकि 6 दिसम्बर उन माताओं की रुलाई का उत्तर है,
जिन्होंने अपने बेटों को रामलला के नाम पर खो दिया था।

क्योंकि 6 दिसम्बर वह दिन है,
जब हिंदू समाज ने कहा—
“अब और अन्याय नहीं सहेंगे।”

आज अयोध्या में भव्य मंदिर खड़ा है… लेकिन उसकी नींव में 1990 का रक्त मिला है 

हजारों रामभक्तों की शहादत ने आखिरकार अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर सत्य में बदल दिया।
लेकिन इतिहास का यह अध्याय कभी मिटाया नहीं जा सकता कि—
कभी इसी अयोध्या में हिंदू अपने ही देवता के दर्शन को गोली खाते-खाते पहुंच पाए थे।

अयोध्या आज भी पूछती है—
“क्या रामभक्तों का अपराध सिर्फ ‘राम’ कहना था?”
“क्या उनके माथे का तिलक ही गोली चलाने की वजह था?”
“क्या निहत्थी आस्था इतना बड़ा खतरा थी?”

और 6 दिसम्बर आते ही पूरी सनातनी चेतना एक स्वर में उत्तर देती है—

“नहीं…
यह हमारे धर्म, हमारी पहचान और हमारी भावनाओं पर हमला था।
जिसका प्रतिकार इतिहास ने किया, और सत्य की जीत हुई।”

अयोध्या आज झुकी नहीं—अयोध्या आज उठी है,
रामलला के सिंहासन के साथ,
और रामभक्तों की शहादत की प्रतिज्ञा के साथ।**

“जो राम का है, वही देश का है।
रामभक्तों का बलिदान हमेशा अमर रहेगा।”

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