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39 देशों पर US एंट्री बैन, क्या अमेरिका को अलग-थलग कर देगा यह फैसला?

वॉशिंगटन/नई दिल्ली,18 दिसम्बर(विशेष संवाददाता)। अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। अपने दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति ट्रंप ने अब तक का सबसे बड़ा और आक्रामक इमीग्रेशन फैसला लेते हुए 39 देशों के नागरिकों की अमेरिका में एंट्री पर पूरी तरह या आंशिक रोक लगा दी है। यह प्रतिबंध 1 जनवरी 2026 से लागू होंगे। व्हाइट हाउस इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत बता रहा है, लेकिन आलोचक इसे ट्रंप की बढ़ती तानाशाही मानसिकता और अमेरिका को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने वाला कदम करार दे रहे हैं।

व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि जिन देशों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, वहां वीजा स्क्रीनिंग, सुरक्षा जांच, वेटिंग लिस्ट और सूचना साझा करने की व्यवस्था में गंभीर खामियां पाई गई हैं। इसके अलावा आतंकवादी गतिविधियां, सरकारी भ्रष्टाचार और वीजा ओवरस्टे की उच्च दर को भी इस फैसले की वजह बताया गया है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह फैसला पूरी तरह डेटा आधारित है और इसका मकसद अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

हालांकि, इस फैसले का राजनीतिक और कूटनीतिक असर कहीं ज्यादा गहरा माना जा रहा है। ट्रंप के इस कदम से बैन वाले देशों की संख्या 19 से बढ़कर 39 हो गई है। इससे पहले जून 2025 में 19 देशों पर प्रतिबंध लगाया गया था। नवंबर में वाशिंगटन में एक अफगान नागरिक द्वारा नेशनल गार्ड पर हमले के बाद ट्रंप ने और सख्ती के संकेत दिए थे, जिसके बाद दिसंबर में इस सूची का विस्तार कर दिया गया।

इस नए आदेश में कुछ वर्गों को छूट भी दी गई है। जिन लोगों के पास पहले से वैध वीजा है, जो अमेरिका के स्थायी निवासी (ग्रीन कार्ड होल्डर) हैं, राजनयिक, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और वे लोग जिनका अमेरिका में प्रवेश “राष्ट्रीय हित” में माना जाता है, वे इस बैन से बाहर रखे गए हैं। बावजूद इसके, लाखों लोगों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है।

यह फैसला ट्रंप के पहले कार्यकाल की याद दिलाता है, जब उन्होंने मुस्लिम बहुल देशों पर ट्रैवल बैन लगाया था। उस समय भारी विरोध के बावजूद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उस बैन को वैध ठहराया था। बाद में जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने पर इन प्रतिबंधों को हटा दिया गया था। अब ट्रंप ने सत्ता में लौटते ही इमीग्रेशन को फिर से अपने राजनीतिक एजेंडे का हथियार बना लिया है।

मानवाधिकार संगठनों और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह नीति आतंकवाद से ज्यादा सामूहिक सजा जैसी है, जिससे आम नागरिक, छात्र और परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। आलोचकों का आरोप है कि ट्रंप सुरक्षा के नाम पर अमेरिका को संकीर्ण राष्ट्रवाद की ओर धकेल रहे हैं, जिससे उसकी वैश्विक साख को नुकसान हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ट्रंप इसी तरह एकतरफा फैसले लेते रहे, तो अमेरिका अपने सहयोगियों से कटता चला जाएगा। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कठोर नीति सच में सुरक्षा बढ़ाएगी या फिर अमेरिका को दुनिया में अकेला और विवादों में घिरा हुआ बना देगी। ट्रंप का यह तानाशाही अंदाज आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश नीति और आंतरिक राजनीति—दोनों पर गहरा असर डाल सकता है।

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