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योग को लोक से जोड़ने का श्रेय गुरु गोरखनाथ को

लखनऊ 6 नवम्बर (एजेंसियां)। भारतीय संस्कृति में योग को जिस लोकधारा से जोड़ा गया, उसका सबसे बड़ा श्रेय नाथ परंपरा के महायोगी गुरु गोरखनाथ को दिया जाता है। उन्होंने योग को केवल साधना या मुक्ति का मार्ग नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जनजीवन, कर्म और लोकजीवन का हिस्सा बना दिया। जब वेदांत और बौद्ध दर्शन ज्ञानियों के मठों तक सीमित हो गए थे, तब गोरखनाथ ने योग को जनता के बीच उतारा — खेतों, चरागाहों, अखाड़ों और साधना के प्रांगणों तक। यही कारण है कि आज योग न केवल आध्यात्मिक अनुशासन है, बल्कि लोक-संस्कृति का अंग भी बन चुका है।
महर्षि पंतजलि ने योग की अपनी इस समृद्ध परंपरा को एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक स्वरूप दिया। जबकि गुरु गोरखनाथ ने योग के अंतर्निहित विशेषताओं को जन सामान्य के लिए सुलभ बनाकर इसे लोककल्याण का जरिया बनाया। गुरु गोरखनाथ और उनके बाद के नाथ योगियों, सिद्धों एवं साधकों ने शरीर को स्वस्थ, मन को स्थिर एवं आत्मा को परमात्मा में प्रतिष्ठित करने वाली इस विधा को लोक तक पहुंचाया। फिर तो योग जाति, धर्म, मजहब, लिंग और भौगोलिक सीमाओं से परे सबके लिए उपयोगी होता गया। आज पूरी दुनिया योग को इसी रूप में स्वीकार भी कर रही है।

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना से जुड़े संप्रदायों में नाथपंथ का महत्वपूर्ण स्थान है। वृहत्तर भारत समेत देश के हर क्षेत्र में नाथ योगियों, सिद्धों, उनके मठों और मंदिरों की उपस्थिति इस पंथ की व्यापकता और प्रभाव का सबूत है।

नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति आदिनाथ भगवान शिव से मानी जाती है। आदिनाथ शिव से मिले तत्वज्ञान को मत्स्येंद्रनाथ ने अपने शिष्य गोरक्षनाथ को दिया। माना जाता है की गुरु गोरक्षनाथ शिव के ही अवतार थे। गुरु गोरक्षनाथ का अपने समय में भारतवर्ष समेत एशिया के बड़े भूभाग (तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि) पर व्यापक प्रभाव था। उन्होंने अपने योग ज्ञान से इन सारी जगहों को कृतार्थ किया।

जॉर्ज गियर्सन के अनुसार गुरु गोरक्षनाथ ने लोकजीवन का परमार्थिक स्तर पर उत्तरोत्तर उन्नयन और समृद्धि प्रदान कर निष्पक्ष, आध्यात्मिक क्रांति का बीजारोपण कर योग रूपी कल्पतरु की शीतल छाया में त्रयताप से पीड़ित मानवता को सुरक्षित कर जो महनीयता प्राप्त की, वह उनकी अलौकिक सिद्धि का परिचायक है। गोरक्षनाथ का योगमार्ग शुष्क विचारात्मक नहीं वरन साधनापरक है। उनका जोर निर्विकार चिंतन और अंतरंग साधना पर है। इस बाबत उनका कहना है कि ‘ज्ञान सबसे बड़ा गुरु और चित्त सबसे बड़ा चेला है। इन दोनों का योग सिद्ध कर जीव को जगत में पारमार्थिक स्वरूप शिव में प्रतिष्ठित रहना चाहिए। यही श्रेष्ठ पथ है।’

गुरु गोरक्षनाथ द्वारा प्रतिपादित योग का इसलिए भी महत्व है क्योंकि उन्होंने योग को वामाचार से निकालकर इसे सात्विक, सदाचार और सद्विचार के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने योग के संबंध में अब तक की अतियों से बचने पर जोर दिया। अपने समय में उन्होंने और उनके बाद नाथपंथ से जुड़े सिद्ध योगियों ने बताया कि योग गृहस्थ, संत, पुरुष, महिला सबके लिए समान रूप से उपयोगी है। इसमें अद्भुत शक्ति होती है। उम्र और क्षमता के अनुसार इसके थोड़े से अभ्यास से बड़ा लाभ संभव है। मन को शांत और तन को निरोग रखने का इससे आसान, सुलभ और प्रभावी दूसरा कोई तरीका नहीं। योग से ही असंतुलीय ऊर्जा को संतुलित किया जा सकता। इस ऊर्जा के पूरी तरह संतुलित होना ही मुक्ति है। इस तरह मुक्ति की चाह रखने वालों के लिए भी इसकी राह योग ही निकालता है।

एलपी टेशीटरी के मुताबिक गोरक्षनाथ जी के योग की खूबी इसकी सर्वजनीनता है। मसलन उनके योग का द्वार सबके लिए खुला है। ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ के मुताबिक योग साधना सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए हमारे ऋषियों, महर्षियों और महान योगियों द्वारा प्रचारित खास किस्म के रसायन हैं। इनका सेवन हर देश, काल, जाति, लिंग, वर्ण, समुदाय, संप्रदाय और पंथ के लोगों के लिए सुलभ और उपयोगी है। उनके मुताबिक अपनी इस परंपरा और सांस्कृतिक थाती को सुरक्षित एव समृद्ध करते हुए देश और समाज की सेवा लिए गोरक्षपीठ प्रतिबद्ध है।

इसी उद्देश्य से गुरु गोरक्षनाथ ने योग को लोककल्याण से जोड़ा। योग मानवता के कल्याण का जरिया बने। हर कोई इसकी उपयोगिता को जाने। इसके जरिये तन को स्वस्थ, मन को स्थिर करे, इसके लिए गुरु गोरखनाथ ने संस्कृत और लोकभाषा दोनों में साहित्य की रचना की। गोरक्ष कल्प, गोरख संहिता, गोरक्ष शतक, गोरख गीता, गोरक्षशास्त्र, ज्ञानप्रकाश शतक, ज्ञानामृत योग, योग चिंतामणि, योग मार्तंड, योग सिद्धांत पद्धति, अमनस्क योग, श्रीनाथ सूत्र, सिद्ध सिद्धांत पद्धति, हठ योग संहिता जैसी रचनाएं इसका प्रमाण हैं।

गोरक्षपीठ योग की इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहा है। वहां महायोगी गुरु गोरक्षनाथ संस्थान द्वारा प्रशिक्षित योग गुरुओं के सानिध्य और निर्देशन में इच्छुक लोगों को योग के सैद्धांतिक और व्याहारिक पक्ष की जानकारी दी जाती है। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि समारोह और अब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भी यह सिलसिला चलता है। करीब हफ्ते भर चलने वाले पुण्यतिथि समारोह के दौरान देश के ज्वलंत मुद्दों पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के एक दिन का विषय योग ही होता है। यही नहीं संस्थान के प्रशिक्षु इसका जीवंत प्रदर्शन भी करते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने ‘हठयोग, स्वरूप एव साधना’ नाम से खुद योग पर एक सारगर्भित किताब लिखी है। इसके अलग-अलग अध्यायों में योग, हठ योग, षटकर्म, आसन मुद्रा, प्रत्याहार, योग निद्रा, प्राणायाम, ध्यान, समाधि, नाद बिंदुसाधना और अजपा जप के बारे में उपयोगी जानकारी है।

योग उतना ही प्राचीन है, जितनी भारतीय संस्कृति। हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, गीता, रामायण, महाभारत, शिव संहिता, गोरक्ष संहिता, घेरण्ड संहिता, हठ योग प्रदीपिका, सिद्ध सिद्धांत और जैन, सांख्य वैशेषिक आदि दर्शनों में भी योग का जिक्र मिलता है। यहां तक कि दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में शुमार मोहनजोदड़ो एवं मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी पर बसे प्राचीन महिष्मति के पुरावशेषों में भी योग के प्रमाण मिलते हैं।

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