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करोड़ों का अस्पताल, कागजी दावे और गायब ‘वार्ड बॉय’: परिजन खींच रहे स्ट्रेचर, CMHO बेच रहे ‘सब ठीक है’ का चूर्ण!  

हेमंत शर्मा, इंदौर। करोड़ों फूंककर चमचमाती 300 बेड की नई बिल्डिंग तो खड़ी कर दी गई, लेकिन इंदौर के जिला अस्पताल की नीयत और नीतियां आज भी वेंटिलेटर पर हैं। सोशल मीडिया पर तैर रहे एक वीडियो ने अस्पताल प्रशासन के दावों का ऐसा जनाजा निकाला है कि जवाब देते नहीं बन रहा। नियम कहते हैं कि स्ट्रेचर खींचने की जिम्मेदारी वार्ड बॉय की है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी यह है कि बेबस परिजन ही अपने मरीज की ‘ट्रॉली’ खींचने को मजबूर हैं।

तमाशा देखिए—वीडियो में एक सर्जन साहब मरीज को ऑटो से उतारने का ‘महान’ काम करते तो दिखते हैं, लेकिन इसके बाद उनका सिस्टम जवाब दे जाता है। वार्ड बॉय को आवाज लगाने की जहमत उठाने के बजाय साहब ने परिजनों के हाथ में ही स्ट्रेचर थमा दिया और अंदर जाने का फरमान सुना दिया। अब यही बेबसी का दृश्य इंटरनेट पर आग की तरह फैल रहा है और महकमे की नाकामी की चुगली कर रहा है।

सवाल सीधा है—जब कागजों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों और वार्ड बॉय की पूरी पलटन तैनात है, तो वे ऐन वक्त पर किस बिल में छिपे थे? क्या यह सिर्फ एक दिन की लापरवाही है या रोज का यही तमाशा है?

सफाई का ‘ऑपरेशन’ और अफसरों का पल्ला झाड़ू खेल

हमेशा की तरह जब पोल खुली, तो मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसनी बचाव में उतर आए। साहब का दावा है कि वीडियो ‘भ्रामक’ है और वो खुद मौके पर मौजूद थे। उनकी थ्योरी के मुताबिक, मरीज गलत दरवाजे से आ गया था और स्ट्रेचर वार्ड बॉय ने ही खींचा था। उलटे धमकी भरे लहजे में यह भी कह दिया कि सरकार की छवि खराब करने वालों पर कलेक्टर से शिकायत कर कार्रवाई कराई जाएगी। यानी, अव्यवस्था सुधारे न सुधारे, पर्दा डालने की तैयारी पूरी है!

दावों और हकीकत की जंग अफसर की ‘पॉलिश की हुई सफाई’ एक तरफ है और आंखों देखा वायरल वीडियो दूसरी तरफ। वीडियो साफ चिल्ला-चिल्लाकर परिजनों की बेबसी बयां कर रहा है। अब देखना यह है कि इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा अपने मातहतों की इस ढकोसलेबाज़ी पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, या निष्पक्ष जांच कराकर इन ‘लापरवाह सूरमाओं’ का हिसाब करते हैं।

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