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70% दर्शक पीएम को देखते ही बदल देते हैं चैनल?

 एक सर्वे ने बढ़ाई सियासी बेचैनी, यूजीसी विवाद से जुड़ी नाराज़गी भी आई सामने

नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा हो गया है। हाल में सामने आए एक सर्वे ने दावा किया है कि लगभग 70 प्रतिशत दर्शक टीवी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देखते ही चैनल बदल देते हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। भले ही इस सर्वे की पद्धति और नमूने पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इससे उपजा राजनीतिक संदेश बेहद गंभीर है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या जनता के एक हिस्से में राजनीतिक थकान या असंतोष बढ़ रहा है?

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री की मीडिया उपस्थिति अभूतपूर्व रही है। सरकारी कार्यक्रमों, उद्घाटनों, विदेश यात्राओं और विशेष प्रसारणों के माध्यम से उनकी दृश्य उपस्थिति लगातार बनी रही है। समर्थकों का तर्क है कि यह मजबूत नेतृत्व और सक्रिय शासन का संकेत है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि लगातार एक ही चेहरे की अधिकता से दर्शकों में ऊब की स्थिति पैदा हो सकती है। सर्वे के निष्कर्ष इसी संभावना की ओर इशारा करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल “ओवर एक्सपोज़र” का मामला नहीं है, बल्कि ज़मीनी मुद्दों पर जनता की अपेक्षाओं से भी जुड़ा है। महंगाई, बेरोज़गारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं, किसानों की आय और शिक्षा व्यवस्था जैसे विषय लगातार चर्चा में हैं। यदि लोगों को लगता है कि इन मुद्दों पर पर्याप्त संवाद या समाधान नहीं मिल रहा, तो वे अपनी नाराज़गी प्रतीकात्मक रूप से टीवी से दूरी बनाकर भी दिखा सकते हैं।

इसी संदर्भ में भाजपा के भीतर हाल में उठे यूजीसी नियमों को लेकर विवाद ने भी माहौल को प्रभावित किया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के कुछ नए प्रावधानों और मसौदों को लेकर पार्टी के ही कुछ नेताओं और सहयोगी संगठनों ने असहमति जताई है। कुछ शिक्षाविदों और छात्र संगठनों से जुड़े भाजपा के विचारधारा निकट नेताओं ने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता से समझौता नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि शिक्षा के क्षेत्र में कोई भी सुधार व्यापक विमर्श और सहमति से होना चाहिए। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि “नीतिगत सुधार जरूरी हैं, लेकिन संवाद की कमी से गलतफहमियां पैदा होती हैं।” वहीं एक अन्य नेता ने सार्वजनिक मंच से बयान दिया कि “शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक विवाद का केंद्र नहीं बनाना चाहिए, बल्कि इसे राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाना चाहिए।” इन बयानों को पार्टी के भीतर उभरती असहजता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम को सरकार के खिलाफ माहौल के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका कहना है कि सर्वे में दिख रही प्रवृत्ति जनता की थकान और असंतोष का परिणाम है। हालांकि सत्ता पक्ष इसे विपक्ष का दुष्प्रचार करार देता है और कहता है कि जमीनी स्तर पर प्रधानमंत्री की लोकप्रियता अब भी मजबूत है। भाजपा के प्रवक्ताओं का तर्क है कि चुनावी नतीजे ही असली पैमाना होते हैं, और हालिया चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन से स्पष्ट है कि जनता का भरोसा कायम है। मीडिया विशेषज्ञों का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि डिजिटल युग में दर्शकों की आदतें तेजी से बदल रही हैं। अब लोग पारंपरिक टीवी की बजाय मोबाइल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय बिताते हैं। ऐसे में किसी भी नेता की टीवी उपस्थिति को सीधे लोकप्रियता से जोड़कर देखना अधूरा विश्लेषण हो सकता है। संभव है कि दर्शक टीवी से हटकर डिजिटल माध्यमों पर वही सामग्री देख रहे हों।

फिर भी यह सर्वे एक मनोवैज्ञानिक संकेत जरूर देता है। राजनीति में धारणा (परसेप्शन) उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविकता। यदि यह धारणा बनने लगे कि जनता का एक बड़ा वर्ग दूरी बना रहा है, तो रणनीतिक स्तर पर बदलाव अनिवार्य हो जाते हैं। भाजपा के भीतर यूजीसी जैसे मुद्दों पर उठती आवाजें भी यह दर्शाती हैं कि पार्टी के अंदर संवाद और संतुलन की जरूरत महसूस की जा रही है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार अपनी संचार रणनीति में बदलाव करती है। क्या मीडिया में उपस्थिति की शैली और आवृत्ति बदलेगी? क्या शिक्षा और अन्य नीतिगत विषयों पर व्यापक संवाद की पहल होगी? फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सर्वे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

जनता का मूड स्थिर नहीं होता, वह समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। यह सर्वे चाहे अंतिम सत्य न हो, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी किसी दल के लिए आसान नहीं होगा। राजनीति में संकेतों को पढ़ना और समय रहते रणनीति समायोजित करना ही दीर्घकालिक सफलता की कुंजी माना जाता है।

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