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मस्तक पर विष्णु चरण: बलि की भक्ति का शिखर

प्रजापति कश्यप की दो पत्नियाँ थीं—दिति और अदिति। अदिति से देवताओं का जन्म हुआ और दिति से दैत्यों का। यही कारण था कि देव और असुरों के बीच वैर जन्मजात था। दोनों पक्षों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता था, जिसे पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है। देवताओं के गुरु आचार्य बृहस्पति थे, जबकि दैत्यों का मार्गदर्शन करते थे महाज्ञानी आचार्य शुक्राचार्य। देवताओं के राजा इंद्र थे, किंतु विलासप्रियता और अहंकार ने उन्हें दुर्बल बना दिया था।

एक समय ऐसा आया जब देव–असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवता असुरों से पराजित हो गए। पराजय के बावजूद दैत्यों की हार स्थायी न रही, क्योंकि आचार्य शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी। अपनी तेजस्वी वाणी से उन्होंने मरे हुए दैत्यों में पुनः प्राण फूँक दिए। रणभूमि में असुर चौगुने उत्साह और पराक्रम के साथ लौटे और देवताओं को पूरी तरह परास्त कर दिया। देवराज इंद्र स्वर्ग त्यागकर भाग खड़े हुए और देवता भयभीत होकर इधर-उधर भटकने लगे।

अपने पुत्रों की यह दुर्दशा देखकर देवमाता अदिति का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने अपनी पीड़ा अपने पति प्रजापति कश्यप से कही। कश्यप ने गंभीर स्वर में कहा—
“देवों की रक्षा अब केवल भगवान विष्णु ही कर सकते हैं। तुम्हें उन्हीं की शरण लेनी होगी।”

कश्यप ने अदिति को भगवान की अनन्य भक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि केवल तप, संयम और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र के जप से ही विष्णु प्रसन्न होंगे। अदिति ने कठोर व्रत किया, केवल दुग्धाहार पर रहीं और इंद्रियों को वश में कर तपस्या में लीन हो गईं।

अदिति की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और वरदान दिया कि वे अदिति के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। समय आने पर अदिति के गर्भ से एक दिव्य बालक उत्पन्न हुआ—वामन। उस बटुक के ब्रह्मतेज के सामने बड़े-बड़े ऋषियों का तेज भी क्षीण प्रतीत होने लगा।

एक दिन वामन ने सुना कि नर्मदा तट के भृगुकच्छ क्षेत्र (वर्तमान भरूच) में असुरराज बलि भव्य अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। वामन ब्राह्मण वेश में यज्ञस्थल पहुँचे। बालक वामन को देखते ही समस्त ब्राह्मण और ऋषि स्तब्ध रह गए। राजा बलि ने अतिथि धर्म का पालन करते हुए वामन का आदरपूर्वक स्वागत किया और उनसे दान माँगने का आग्रह किया।

वामन ने विनम्र स्वर में कहा—
“राजन, मुझे न धन चाहिए, न वैभव। केवल संध्या वंदन के लिए तीन पग भूमि दे दीजिए।”

बलि चकित रह गए। उन्होंने आग्रह किया कि वामन कुछ बड़ा दान स्वीकार करें, किंतु वामन अपने आग्रह पर अडिग रहे। यज्ञस्थल पर उपस्थित शुक्राचार्य इस रहस्य को समझ गए। उन्होंने बलि को चेताया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं विष्णु हैं। किंतु सत्यप्रतिज्ञ बलि अपने वचन से पीछे हटने को तैयार न हुए।

बलि ने कहा—
“मैं प्रह्लाद का पौत्र हूँ। सत्य से डरने वाला नहीं। वचन दे चुका हूँ, चाहे सर्वस्व चला जाए, मैं पीछे नहीं हटूँगा।”

तब वामन ने अपना विराट रूप धारण किया। पहला पग पाताल लोक को लाँघ गया, दूसरा पग स्वर्ग और सत्यलोक तक पहुँच गया। तीसरे पग के लिए जब कोई स्थान न बचा तो वामन ने पूछा—
“राजन, अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?”

क्षण भर भी विलंब न करते हुए राजा बलि ने अपना मस्तक आगे कर दिया—
“प्रभु, मेरा सिर आपके चरणों के लिए समर्पित है।”

वामन ने चरण बलि के मस्तक पर रख दिया। उसी क्षण बलि धन्य हो गए। प्रह्लाद स्वयं प्रकट हुए और अपने पौत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की। भगवान विष्णु ने बलि को वरदान दिया कि वे पाताल लोक के अधिपति होंगे और स्वयं विष्णु उनके द्वारपाल बनकर निवास करेंगे। साथ ही भविष्य में उन्हें इंद्र पद की प्राप्ति का भी वर दिया।

इस प्रकार देवताओं को स्वर्ग पुनः प्राप्त हुआ, अदिति की तपस्या सफल हुई और राजा बलि सत्य, दान और भक्ति के अमर प्रतीक बन गए।

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