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यूजीसी नियम पर उठे सवाल: क्या भाजपा अपनी ही विचारधारा से भटक रही है?

नई दिल्ली, 23 फरवरी(भृगु नागर)। भारतीय राजनीति में अक्सर यह कहा जाता रहा है कि विचारधारा ही किसी दल की आत्मा होती है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने उदय काल से ही स्वयं को “हिन्दू एकता” और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सूत्र से जोड़कर प्रस्तुत किया। दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) पर लंबे समय तक “मुस्लिम तुष्टीकरण” की राजनीति का आरोप लगता रहा। किंतु हाल ही में लाए गए यूजीसी से जुड़े नए नियमों ने राजनीतिक परिदृश्य में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आलोचकों का आरोप है कि इन नियमों ने भाजपा के अपने घोषित “हिन्दू एकता” के एजेंडे को ही चुनौती दे दी है।

यूजीसी नियमों को लेकर देश के कई हिस्सों में विमर्श तेज हुआ है। शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति, आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक ढांचे से जुड़े प्रावधानों को लेकर विभिन्न वर्गों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सवर्ण संगठनों और कुछ परंपरागत समर्थक समूहों ने इसे अपने हितों के विपरीत बताया है, तो वहीं दलित-पिछड़ा संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में कदम करार दिया है। इस बहस के केंद्र में यह प्रश्न है कि क्या भाजपा अपने मूल सामाजिक आधार को साधने में असमंजस की स्थिति में है?

भाजपा का वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) रहा है, जिसने लंबे समय तक हिन्दू समाज को जातीय विभाजनों से ऊपर उठाकर एक सांस्कृतिक पहचान में पिरोने की बात कही। “सबका साथ, सबका विकास” और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” जैसे नारे इसी दिशा में प्रयास माने गए। परंतु जब नीतिगत निर्णय ऐसे आते हैं, जिनसे किसी वर्ग में असंतोष पनपता है, तो राजनीतिक विरोधी इसे भाजपा के अंदरूनी विरोधाभास के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं।

हाल के महीनों में भाजपा को न केवल विपक्षी दलों से बल्कि अपने परंपरागत समर्थकों से भी आलोचना झेलनी पड़ी है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने यूजीसी नियमों को लेकर भाजपा पर तीखा हमला बोला है। आरजेडी का आरोप है कि भाजपा शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक संतुलन बिगाड़ना चाहती है। वहीं उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी विपक्षी दलों ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि भाजपा के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद की चर्चाएं सामने आई हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी को ऐसे निर्णयों से पहले व्यापक संवाद स्थापित करना चाहिए था। पार्टी के वैचारिक समर्थक वर्ग में यह भावना व्यक्त की जा रही है कि हिन्दू एकता का नारा तभी प्रभावी रहेगा जब सभी वर्गों को समान सम्मान और प्रतिनिधित्व का अनुभव हो। यदि किसी नीति से यह संदेश जाए कि एक वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है, तो इससे दीर्घकालीन राजनीतिक नुकसान संभव है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 से लेकर अब तक कई बड़े निर्णय लिए हैं, जिन्हें समर्थकों ने “साहसिक” बताया। लेकिन हर निर्णय के साथ सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी बदलते हैं। यूजीसी नियमों पर उठे विवाद ने भाजपा को यह सोचने पर विवश किया है कि उसकी नीति-निर्माण प्रक्रिया में संवाद और संतुलन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस पर वर्षों तक जिस “तुष्टीकरण” की राजनीति का आरोप लगाया गया, उसी प्रकार की छवि यदि भाजपा पर “वर्गीय असंतुलन” या “जातीय ध्रुवीकरण” के रूप में बनने लगी, तो यह उसके लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी। भाजपा ने 2014 और 2019 में व्यापक सामाजिक गठजोड़ के सहारे सफलता प्राप्त की थी। यदि उस गठजोड़ में दरार पड़ती है, तो विपक्ष को अवसर मिल सकता है।

हालांकि भाजपा नेतृत्व का दावा है कि यूजीसी नियमों का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना है, न कि किसी विशेष वर्ग को नुकसान पहुंचाना। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष जानबूझकर भ्रम फैला रहा है। आरएसएस से जुड़े कुछ विचारकों ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि सामाजिक समरसता भाजपा की प्राथमिकता है और कोई भी नीति उसी दिशा में होगी।

फिर भी, जनमानस में उठ रहे प्रश्नों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। “क्या कालनेमियों के हाथ में देश की बागडोर है?”—जैसी तीखी अभिव्यक्तियां सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं। यह भाषा भले ही भावनात्मक हो, पर यह संकेत देती है कि नीति-निर्माण में पारदर्शिता और संवाद की अपेक्षा बढ़ गई है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस विवाद को कैसे संभालती है। क्या वह व्यापक परामर्श के माध्यम से असंतोष को शांत करेगी, या विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी विमर्श का स्थायी हिस्सा बना देगा? फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यूजीसी नियमों ने केवल शिक्षा नीति का नहीं, बल्कि भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता का भी परीक्षण शुरू कर दिया है।

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